For Free Consultation, dial 73 986 73 986, 74 238 74 238 (7am-9pm)
Blog
ayurveda india, ayurvedic tablet, ayurvedic home remedies, divya kit online, divya kit, divya upchar,

थैलेसीमिया

देश में 5 करोड़ लोग थैलेसीमिया से पीड़ित हैं और प्रत्येक वर्ष 10 से 12 हजार बच्चे थैलेसीमिया के साथ जन्म लेते हैं। लेकिन इन भयावह आंकड़ों के बावजूद भी लोगों में इस बीमारी को लेकर अभी भी जागरूकता की कमी है।

 सबसे पहले जानते हैं की थैलेसीमिया क्या है और यह कैसा होता है ? थैलेसीमिया बच्चों को माता-पिता से मिलने वाला एक आनुवांशिक रोग है। लेकिन जागरूकता की कमी के कारण दुनिया में इस रोग से पीड़ित बच्चों की संख्या बढ़ रही है। यह बीमारी बच्चों को अधिकतर ग्रसित करती है तथा उचित समय पर उपचार न होने पर मृत्यु तक हो सकती है। सामान्य रूप से शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र करीब 120 दिनों की होती है, परंतु थैलेसीमिया होने के कारण इनकी उम्र सिमटकर मात्र 20 दिनों की हो जाती है। इस रोग में शरीर की हीमोग्लोबिन निर्माण की प्रक्रिया पर सीधा प्रभाव पड़ता है जिसमे हीमोग्लोबिन की मात्रा कम होने लगती है और शरीर दुर्बल होने लगता है परिणाम स्वरुप शरीर किसी न किसी रोग से ग्रसित रहता है और रोगी को बार बार खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है।

थैलेसीमिया दो प्रकार का होता है :

  1. मेजर थैलेसीमिया
  2. माइनर थैलेसीमिया

महिलाओं एवं पुरुषों के शरीर में मौजूद क्रोमोज़ोम खराब होने से माइनर थैलेसीमिया हो सकता है। यदि दोनों क्रोमोज़ोम खराब हो जाए तो यह मेजर थैलेसीमिया भी बन सकता है।महिला व पुरुष में क्रोमोज़ोम में खराबी होने की वजह से उनके बच्चे के जन्म के छह महीने बाद शरीर में खून बनना बंद हो जाता है और उसे बार-बार खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है।

रोग की पहचान :-

इसकी पहचान तीन महिने की आयु के बाद ही होती है। दरअसल रोग से प्रभावित बच्चे के शरीर में रक्त की तेजी से कमी होने लगती है जिसके चलते उसे बार-बार खून चढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है।

थैलेसीमिया के लक्षण :

  •  थकान
  • भूख कम लगना
  • बच्चे में चिड़चिड़ापन होना
  • गहरा व गाढ़ा मूत्र
  • सामान्य तरीके से विकास न होना
  • कमजोरी महसूस होना
  • त्वचा का पीला रंग (पीलिया) हो जाना
  • पेट में सूजन होना
  • रोगी को हमेशा सर्दी, जुकाम बना रहना

 

थैलेसीमिया की रोकथाम

बच्चा थैलेसीमिया रोग के साथ पैदा ही न हो, इसके लिए शादी से पूर्व ही लड़के और लड़की की खून की जांच अनिवार्य कर देनी चाहिए। यदि शादी हो भी गयी है तो गर्भावस्था के 8 से 11 सप्ताह में ही डीएनए जांच करा लेनी चाहिए। माइनर थैलेसीमिया से ग्रस्थ इंसान सामान्य जीवन जी पाता है और उसे आभास तक नहीं होता कि उसके खून में कोई दोष है। तो यदि शादी के पहले ही पति-पत्नी के खून की जांच हो जाए तो कफी हद तक इस आनुवांशिक रोग से बच्चों को बचाया जा सकता है।

क्या खाएं क्या नहीं :

रोगियों को वही भोजन देना चाहिए जिसमें आयरन की मात्रा कम हो। लेकिन यह भी ध्यान रखें कि हिमोग्लोबिन की कमी न हो। प्रोटीन युक्त पदार्थ खाने से बचें, समय पर दवाइयाँ लें और इलाज पूरा करवाएं।

मटर, पालक, हरी पत्तेदार सब्जियाँ, तरबूज, किशमिश, खजूर नहीं खाना चाहिए। स्वास्थ्यवर्धक आहार लें और संक्रमण ना होने दें। व्यायाम नियमित करें और डॉक्टर से अपने लिए उचित व्यायाम करने की जानकारी लें।

 

For natural, 100% ayurvedic treatment of thalassemia diseases, thalassemia treatment, you can consider this medicine:
https://www.divyaupchar.com/product/divya-kit/

Leave your thought

Compare
Wishlist 0
Open wishlist page Continue shopping